संसद तो धन्य हुई |

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Blog, Blog 2015

धन्यवाद सांसद जी,
पहले शरद यादव और अब गिर्राज शंकर जी !

संसद तो धन्य हुई !
राह मे चलते छिछोरे, गली के नुक्कड़ पर पान वाले की दुकान के मनचले, टेम्पो बस, ऑटो मे झूमते हुए लम्पट यदि इस भाषा का प्रयोग है तो हम उन्हें अनदेखा-अनसुना कर सोचते हैं कि कौन इनके मुँह लगे ? आवारा हैं, आवारा ही रहेंगे ! यह जो जमात होती है जिसने अपने घरों मे अपनी माँ को जलील होते रोज देखा है, पिटते देखा है, अपमानित होते देखा है ! बहन को भाई के लिए डाँट खाते देखा है , अपनी थाली का निवाला भाई के लिए छीनते देखा है, भाई से मार खाते, छिड़े जाने पर बिलखते देखा है ! यह औरत की क्या इज्जत करेंगें ?
लेकिन संसद तो पवित्र स्थल है ! यहाँ पर तो सभ्य लोग आते हैं ! शायद पढ़े- लिखे भी होते हैं ! इसलिए हम अपेक्षा करते हैं कि वे सभ्यता से विचार रखेंगे !
लेकिन धन्यवाद उनका कि उन्होंने हमें अवगत कराया कि संसद उन्ही मनचलों से भरी हुई है !
कहने मे अतिश्योक्ति नहीं होगी कि संसद मे प्रतिनिद्धत्व करने वाले समाज का ही आइना होते हैं ! जैसा हमारा समाज होगा, जिस मानसिकता का समाज होगा, जिस सोच का समाज होगा वह वैसे ही प्रतिनिधि चुन कर लाएगा !
किसी को कोई क्षोभ नहीं ! अभद्र टिप्पणी करने पर कोई खेद नहीं ! एक दिन करो, फिर दूसरे दिन उससे खराब कर दो ! एक दिन एक वाक्य बोला, फिर अगले दिन क्षमा माँग लेने से सोचा मामला समाप्त हो गया ! आपस की बातचीत ही तो थी !
बोलना, एक सोच का प्रतीक है ! शब्द उन विचारों का अमली-जामा है, जो आपके दिमाग मे चल रहें है !
मैं उन सड़क पर चलने वाले मनचलों को अनदेखा-अनसुना कर सकती हूँ , पर उन सांसदों का क्या करूँ ? उनके खिलाफ किससे कहूँ ? उनकी सोच कैसे बदलूँ ?
समाज मे सुधार सिर्फ चाहने से नहीं कुछ ठोस करने से होगा !
उखाड फेंकिए ऐसी गिरी मानसिकता वाले तथाकथित नेताओं को जो देवी की पूजा करते हैं पर स्त्री का अपमान करने से नहीं चूकते !


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